दीवार

बेड़िया भितर है, बाहर छटपटाहट है
पाणी है और प्यास भी, अटपटाहट है !
‘लोग क्या कहेंगे’ की जो एक दिवार है,
तोड दे, तेरी खुशीया उसके ही पार है |

  • रुपेश घागी

(३० मई, २०१९)

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मुलाकात

मिल, खुल के मिल, फिक्र मत कर,
मुलाकात का कहीं जिक्र मत कर,
जो भी है दरमीयाँ, कोई नाम ना दे
दुनिया पे छोड, खुद इल्जाम ना दे !

– रुपेश घागी

(२९ मई, २०१९)

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अंतर्मुख

जब कांच से ज्यादा आईना चुभता‌ है,
जब शब्द से ज्यादा मायना चुभता‌ है,
तब खामोशी से खुद को टटोलते है,
खुद से मिलते है, और कम बोलते है !

  • रुपेश घागी

(२८ मई, २०१९)

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बुद्ध…

शुन्य में नजर और मुखपर मुस्कान है
वह‌ अचल है, समय का इम्तिहान है,
एक अवस्था, अस्वस्थता के पार की,
अंतर्बाह्य शुन्यता के संपुर्ण स्विकार की !

– रुपेश घागी

(२७ मई, २०१९)

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