अंतर्मुख

जब कांच से ज्यादा आईना चुभता‌ है,
जब शब्द से ज्यादा मायना चुभता‌ है,
तब खामोशी से खुद को टटोलते है,
खुद से मिलते है, और कम बोलते है !

  • रुपेश घागी

(२८ मई, २०१९)

(Photo Credit: www.pixabay.com)

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